जैन धर्म में कर्म क्या है? प्रकार, प्रभाव और मुक्ति
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तत्वार्थ सूत्र अध्याय 8 पर आधारित
जैन धर्म में, कर्म केवल कार्य-कारण का नियम नहीं है; यह सूक्ष्म भौतिक द्रव्य (पुद्गल) है जो ब्रह्मांड में तैरता है और हमारे कषायों (क्रोध, मान, माया, लोभ) के कारण आत्मा से चिपक जाता है।
कर्म के 8 मुख्य प्रकार
- ज्ञानावरणीय: ज्ञान को रोकने वाला।
- दर्शनावरणीय: दर्शन को रोकने वाला।
- मोहनीय: मोह पैदा करने वाला।
- अंतराय: विघ्न पैदा करने वाला।
- वेदनीय: सुख-दुख का अनुभव कराने वाला।
- नाम: शरीर का निर्माण करने वाला।
- गोत्र: कुल का निर्धारण करने वाला।
- आयु: उम्र का निर्धारण करने वाला।
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Frequently Asked Questions
क्या सभी कर्म बुरे होते हैं?
जैन धर्म में पुण्य भी एक बंधन है, हालांकि यह पाप से बेहतर है। अंतिम लक्ष्य सभी कर्मों से मुक्ति है।
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